शिमला।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) की समाप्ति किसी राजनीतिक दल या सरकार का मुद्दा नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की जनता के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 16वें वित्त आयोग द्वारा आरडीजी को पूरी तरह समाप्त किया गया, तो इसका दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव राज्य की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों पर पड़ेगा।
वित्त विभाग द्वारा राज्य की वित्तीय स्थिति और आरडीजी समाप्ति के प्रभावों पर दी गई प्रस्तुति के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल जैसे पहाड़ी और सीमित संसाधनों वाले राज्य के साथ यह निर्णय अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि राज्य के बजट का करीब 12.7 प्रतिशत हिस्सा आरडीजी से आता है और इसके खत्म होने से वेतन, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और विकास कार्यों पर संकट खड़ा हो जाएगा।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि यह लड़ाई राजनीति से ऊपर उठकर लड़ी जानी चाहिए और वे इस मुद्दे पर भाजपा सांसदों व विधायकों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री से मिलने को भी तैयार हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि इस अहम विषय पर बुलाई गई प्रस्तुति में भाजपा विधायक शामिल नहीं हुए।
उन्होंने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य की कर संग्रह क्षमता कमजोर हुई है, क्योंकि हिमाचल एक उत्पादक राज्य है और जीएसटी उपभोग आधारित कर प्रणाली है। इसके साथ ही राज्य के पास आय के सीमित स्रोत—नदियां, वन संपदा और पर्यटन—ही उपलब्ध हैं।
मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से मांग की कि जिन जलविद्युत परियोजनाओं ने अपना ऋण चुका दिया है, उनमें राज्य को कम से कम 50 प्रतिशत रॉयल्टी दी जाए और 40 वर्ष पूरे कर चुकी परियोजनाएं राज्य को लौटाई जाएं। उन्होंने भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड की बकाया राशि और शानन पावर प्रोजेक्ट के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया।
मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार बिना आम जनता पर अतिरिक्त बोझ डाले संसाधन जुटाने और कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि हिमाचल के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा और राज्य को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास और तेज किए जाएंगे।