शिमला,
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के बहुचर्चित युग हत्याकांड में 11 वर्ष बाद भी न्याय की उम्मीद लिए पीड़ित परिजन अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। मासूम युग के पिता विनोद गुप्ता ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है।
गौरतलब है कि 23 सितंबर 2024 को हिमाचल हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में संशोधन करते हुए एक आरोपी तेजिंद्र पाल को बरी कर दिया था, जबकि दो अन्य दोषियों चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।
पीड़ित परिवार ने इस फैसले को गलत बताते हुए अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
मामले का संक्षिप्त इतिहास
- 14 जून 2014 को शिमला के रामबाजार निवासी विनोद गुप्ता के 4 वर्षीय बेटे युग का अपहरण हुआ था।
- आरोपियों ने बच्चे को रामचंद्रा चौक के पास किराये के मकान में रखकर उसे यातनाएं दीं।
- एक हफ्ते तक प्रताड़ित करने के बाद मासूम को भराड़ी स्थित नगर निगम के पेयजल टैंक में जिंदा फेंक दिया गया।
- 22 अगस्त 2016 को सीआईडी ने आरोपी विक्रांत बख्शी की निशानदेही पर टैंक से युग की हड्डियां बरामद की थीं, जिसके बाद चंद्र शर्मा और तेजिंद्र पाल को गिरफ्तार किया गया।
- 5 सितंबर 2018 को जिला अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
- पुष्टिकरण के बाद मामला हाईकोर्ट गया, जहां सजा में बदलाव किया गया।
परिजनों का दर्द : “जिसने सबसे ज्यादा यातना दी, वही बरी हो गया”
स्व. युग के पिता विनोद गुप्ता ने कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है:
- “जिस आरोपी की सबसे ज्यादा संलिप्तता थी, उसे ही बरी कर दिया गया। यह हमारे लिए असहनीय है।”
- “हम चाहते हैं कि तीनों आरोपियों को निचली अदालत के अनुसार फांसी की ही सजा मिले।”
- “मेरे बच्चे को तड़पाया गया, जिंदा टैंक में डाल दिया गया… यह जघन्य अपराध है।”
- “सीआईडी ने कड़ी मेहनत की थी, पर हाईकोर्ट ने जिस तरह निर्णय दिया, वह स्वीकार योग्य नहीं।”
उन्होंने बताया कि उनकी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका स्वीकार हो चुकी है, हालांकि केस की सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है।