शिमला,
राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने मातृभाषाओं और स्थानीय बोलियों के संरक्षण के साथ-साथ प्राचीन भारतीय लिपियों के पुनरुद्धार के लिए शोध कार्यों को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा पर गर्व करने के साथ अन्य भारतीय भाषाओं को सीखना और समझना राष्ट्रीय एकता तथा सांस्कृतिक संवाद को और मजबूत करता है।
राज्यपाल बुधवार को लोक भवन में आयोजित ‘अक्षर से आत्मबोध तकः त्रिभाषा सूत्र’ पुस्तक के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। पुस्तक का लेखन प्रो. सत प्रकाश बंसल, इंदर सिंह ठाकुर, प्रो. सुमन शर्मा और डॉ. अशोक शर्मा ने किया है।
भाषा देश की संस्कृति और सामूहिक चेतना की पहचान
राज्यपाल ने पुस्तक के लेखकों और प्रकाशन से जुड़े सभी लोगों को बधाई देते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की भाषा उसकी संस्कृति, आत्मा और सामूहिक चेतना को प्रतिबिंबित करती है। उनके अनुसार, यह पुस्तक केवल भाषा और शिक्षा से संबंधित अकादमिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति को समझने, विरासत को संरक्षित करने और भविष्य की दिशा तय करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
पुस्तक के शीर्षक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अक्षर ज्ञान की शुरुआत करते हैं, शब्द विचारों को अभिव्यक्ति देते हैं और विचार विवेक की नींव बनते हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी हासिल करना नहीं, बल्कि समझ, संवेदनशीलता, विवेक और आत्मबोध का विकास करना भी है।
उन्होंने कहा कि मातृभाषाएं किसी समाज की सामूहिक स्मृतियों, जीवन अनुभवों और सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम हैं।
‘अनेक भाषाएं, एक राष्ट्र’ की भावना को मजबूत करने की जरूरत
राज्यपाल ने कहा कि भारत भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। भारतीय भाषाओं में साहित्य, दर्शन, इतिहास, पारंपरिक ज्ञान और मानवीय मूल्यों की समृद्ध विरासत समाहित है। प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक अलग दृष्टिकोण और अनुभवों का संसार समेटे हुए है।
उन्होंने कहा कि भारत की एकता का आधार यह नहीं है कि सभी लोग एक ही भाषा बोलें, बल्कि यह है कि अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों, विचारों और भावनाओं का सम्मान करते हुए सभी एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहें।
राज्यपाल ने कहा कि किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखना केवल एक नई भाषा सीखना नहीं, बल्कि एक नई सांस्कृतिक दुनिया को समझने का अवसर भी है। उन्होंने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना और काशी तमिल संगमम् जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करते हैं।
प्राचीन भारतीय लिपियों के संरक्षण के लिए शोध पर जोर
राज्यपाल ने विश्वविद्यालयों से प्राचीन भारतीय लिपियों के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए शोध आधारित पहल शुरू करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को समझने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए प्राचीन भाषाओं और लिपियों का अध्ययन महत्वपूर्ण है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ‘अक्षर से आत्मबोध तकः त्रिभाषा सूत्र’ पुस्तक भारतीय भाषाओं, बहुभाषी शिक्षा और भारत की ज्ञान परंपराओं के अध्ययन को नई दिशा देने के साथ इस विषय पर सार्थक संवाद को भी प्रोत्साहित करेगी।
हिमाचल की लोक बोलियों में छिपी है समृद्ध विरासत
हिमाचल प्रदेश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्रदेश की लोक बोलियां, लोकगीत, कहानियां और परंपराएं पहाड़ी समाज के अनुभवों, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और पीढ़ियों से संचित ज्ञान को संरक्षित करती हैं।
उन्होंने मातृभाषा और स्थानीय बोलियों के संरक्षण के लिए परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया।
त्रिभाषा सूत्र को प्रभावी बनाने में सहायक होगी पुस्तक
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति एवं पुस्तक के सह-लेखक प्रो. सत प्रकाश बंसल ने राज्यपाल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पुस्तक विद्यार्थियों को समाज और संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश देती है। उन्होंने भाषा और संस्कृति के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि व्यक्ति समाज और राष्ट्र से जुड़कर राष्ट्र निर्माण में सामूहिक योगदान दे सकता है।
मुकुल कांतिकर ने कहा कि भारत में भाषा भावनाओं और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है। उन्होंने ‘अनेक भाषाएं, एक भाव’ के सिद्धांत को भारतीय संस्कृति में एकता की भावना का प्रतीक बताया।
शिक्षा सचिव राकेश कंवर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में त्रिभाषा सूत्र को प्रोत्साहित करने के लिए लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश के विद्यालयों में उर्दू और संस्कृत को अतिरिक्त भाषाओं के रूप में पढ़ाया जाता रहा है, जबकि कुछ विद्यालयों में पंजाबी भी पढ़ाई जाती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह पुस्तक त्रिभाषा सूत्र के प्रभावी क्रियान्वयन को आगे बढ़ाने में उपयोगी साबित होगी।
समारोह में हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, शिमला की कुलपति प्रो. प्रीति सक्सेना, राज्यपाल के सचिव संदीप भारद्वाज, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।