नूरपुर (कांगड़ा),
राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता ने कहा कि संस्कृत भारत की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ उसकी प्राचीन ज्ञान परंपराओं का महत्वपूर्ण आधार है। इस भाषा में निहित ज्ञान को संरक्षित करने के साथ आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।
राज्यपाल कांगड़ा जिले में नूरपुर के समीप मल्कवाल स्थित के.बी.वी.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय संस्कृत भारती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने संगोष्ठी का शुभारंभ किया और देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे प्रतिभागियों तथा आयोजकों को बधाई दी।
वेदों और प्राचीन ग्रंथों में समाहित है ज्ञान का भंडार
राज्यपाल ने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों ने सदियों से भारत की दर्शन, विज्ञान, नैतिकता और मानवीय मूल्यों से जुड़ी परंपराओं को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने संस्कृत भारती की ओर से संस्कृत को आम लोगों तक पहुंचाने और इसे दैनिक बातचीत की भाषा बनाने के प्रयासों की सराहना की।
उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद सहित अनेक विषयों से जुड़ा महत्वपूर्ण ज्ञान उपलब्ध है। इस ज्ञान का प्रमाणिक और गहन अध्ययन कर उसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की जरूरत है। उन्होंने विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से संस्कृत के अध्ययन, शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करने का भी आग्रह किया।
सरदार पटेल के योगदान को किया याद, दिलाई राष्ट्रीय एकता की शपथ
सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है। उनके नेतृत्व में लगभग 562 रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ, जिससे राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूती मिली। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों को राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलाई गई।
राज्यपाल ने कहा कि भारतीय इतिहास और शिक्षा व्यवस्था में आर्यभट्ट, पाणिनि, सुश्रुत और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों के योगदान को उचित स्थान मिलना चाहिए। इसके साथ ही तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों की विरासत को भी सम्मान के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए घरों में हो नियमित इस्तेमाल
राज्यपाल ने मातृभाषाओं और स्थानीय बोलियों के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी भाषा को जीवित रखने के लिए उसका दैनिक जीवन में उपयोग जरूरी है। विशेष रूप से परिवारों के भीतर मातृभाषाओं में संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
हिमाचल प्रदेश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की स्थानीय बोलियों पर संस्कृत का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से हिमाचल प्रदेश को देश के दूसरे संस्कृत भाषी राज्य का दर्जा प्राप्त है।
उन्होंने युवाओं से संस्कृत को केवल परीक्षा का विषय न मानकर सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में अपनाने की अपील की। उनके अनुसार परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। दोनों के समन्वय से ही देश की प्रगति को नई दिशा मिल सकती है।
इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने संगोष्ठी को भारत की विविधता में एकता का उदाहरण बताया।
कार्यक्रम में संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष रमेश कुमार पांडेय, अखिल भारतीय महामंत्री सत्यनारायण भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा, पूर्व मंत्री एवं स्वागत समिति के अध्यक्ष राकेश पठानिया, भटियात के पूर्व विधायक विक्रम जरियाल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।